Livebharatsamachar ब्यूरो: हिमाचल प्रदेश की दुर्गम पहाड़ियों में प्रस्तावित चेनाब-ब्यास नदी जोड़ो परियोजना एक बार फिर पर्यावरणविदों और स्थानीय निवासियों के निशाने पर है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस महत्वाकांक्षी जलविद्युत परियोजना के तहत बनने वाले बैराज और लंबी सुरंगें हिमालयी क्षेत्र में ‘वॉटर बम’ की तरह साबित हो सकती हैं, जो ग्लेशियर फटने और अचानक बाढ़ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) के जोखिम को कई गुना बढ़ा देंगी।
पर्यावरणीय संतुलन पर गहरा संकट
हिमालयी क्षेत्र पहले से ही जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना के लिए पहाड़ों के भीतर बनाई जाने वाली विशाल सुरंगें भूगर्भीय स्थिरता को प्रभावित करेंगी। चेनाब और ब्यास जैसी नदियों के बहाव में छेड़छाड़ करना पारिस्थितिकी तंत्र के लिए घातक हो सकता है।
स्थानीय पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य न केवल भूस्खलन को बढ़ावा देते हैं, बल्कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर आपदाओं को निमंत्रण देते हैं।
मुख्य चिंताएं और जोखिम
- ग्लेशियल फ्लड का खतरा: सुरंगों के निर्माण से पहाड़ों के भीतर कंपन पैदा होता है, जिससे ग्लेशियरों के टूटने की आशंका बढ़ जाती है।
- बैराज का दबाव: बैराज के निर्माण से जलभराव का स्तर बढ़ता है, जो भूकंपीय रूप से सक्रिय इस क्षेत्र में जोखिम पैदा करता है।
- पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश: नदियों के मार्ग बदलने से स्थानीय जैव विविधता और जलीय जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
स्थानीय निवासियों का विरोध
परियोजना प्रभावित क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि उन्हें विस्थापन के साथ-साथ हर साल आने वाली बाढ़ का डर सता रहा है। सरकार की ओर से विकास के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन स्थानीय समुदाय इसे अपनी सुरक्षा के साथ समझौता मान रहे हैं। पर्यावरणविदों ने सरकार से मांग की है कि इस परियोजना का पुनर्मूल्यांकन किया जाए और हिमालय की नाजुक स्थिति को देखते हुए इसे रद्द किया जाए।