Livebharatsamachar ब्यूरो: दुनिया भर में रेबीज के खिलाफ जंग जारी है, जहाँ चिली और भूटान जैसे देशों ने अपने अनुकरणीय प्रयासों से इस घातक बीमारी पर लगाम लगाकर दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की है। वहीं, भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक रेबीज मुक्त भारत का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन जमीनी हकीकत और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की चुनौतियां इस राह में बड़ी बाधा बनी हुई हैं।
चिली और भूटान की सफलता से सीख
चिली और भूटान ने सामूहिक टीकाकरण अभियान, आवारा कुत्तों की आबादी के प्रबंधन और सार्वजनिक जागरूकता के दम पर रेबीज को नियंत्रित करने में बड़ी सफलता हासिल की है। इन देशों ने यह साबित कर दिया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और सही रणनीति हो, तो रेबीज जैसी लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी को भी जड़ से खत्म किया जा सकता है।
भारत के सामने चुनौतियां
भारत में रेबीज के मामलों की संख्या अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं:
- आवारा कुत्तों की अनियंत्रित आबादी और उनका टीकाकरण न होना।
- ग्रामीण क्षेत्रों में रेबीज के प्रति जागरूकता का अभाव।
- कुत्ते के काटने के बाद समय पर एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) की उपलब्धता में कमी।
- पशु चिकित्सा सेवाओं और मानव स्वास्थ्य सेवाओं के बीच समन्वय का अभाव।
विशेषज्ञों का कहना है कि रेबीज उन्मूलन केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसके लिए नगर निकायों, पशुपालन विभाग और आम जनता के बीच एक मजबूत तालमेल की आवश्यकता है।
2030 का लक्ष्य और आगे की राह
भारत के 2030 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण को अपनाना अनिवार्य है। इसमें मनुष्यों, जानवरों और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल हजारों लोग रेबीज का शिकार होते हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा बच्चों का होता है।
निष्कर्ष
रेबीज को खत्म करना एक कठिन लेकिन असंभव कार्य नहीं है। यदि भारत सरकार अपने टीकाकरण कार्यक्रमों को और अधिक आक्रामक बनाए और राज्यों के साथ मिलकर जमीनी स्तर पर निगरानी तंत्र को मजबूत करे, तो 2030 तक रेबीज मुक्त भारत का सपना साकार हो सकता है।