Livebharatsamachar ब्यूरो: सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग सैनिकों के प्रति सरकार के रवैये पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि देश की रक्षा करने वाले सैनिकों को उनके कानूनी अधिकारों और लाभों से वंचित रखना पूरी तरह से अनुचित है। जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि दिव्यांगता पेंशन और अन्य लाभों को लेकर सरकार का रुख सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए, न कि बाधा पैदा करने वाला।
मामले की पृष्ठभूमि और अदालती टिप्पणी
न्यायालय ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि सेना के उन जवानों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता जिन्होंने देश की सेवा में अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगा दिया। कोर्ट ने कहा कि तकनीकी आधारों पर सैनिकों को उनके हक से रोकना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह सैनिकों के मनोबल को भी प्रभावित करता है। पीठ ने सरकार से उन सभी लंबित मामलों की समीक्षा करने को कहा है जिनमें दिव्यांग सैनिकों को लाभ नहीं मिल पा रहा है।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, ‘सैनिकों के साथ व्यवहार करते समय सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने राष्ट्र के लिए क्या बलिदान दिया है। दिव्यांगता पेंशन को लेकर नियमों की व्याख्या उदार होनी चाहिए, न कि संकीर्ण।’
प्रमुख बिंदु:
- दिव्यांग सैनिकों को पेंशन और अन्य लाभों में हो रही देरी पर कोर्ट ने जताई चिंता।
- सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह दिव्यांगता के दावों को निपटाने के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया अपनाए।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों का हवाला देकर सैनिकों को उनके हक से वंचित करना स्वीकार्य नहीं है।
- भविष्य में ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है।
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब रक्षा मंत्रालय को अपनी नीतियों में बदलाव करने और लंबित मामलों के निस्तारण के लिए एक समयबद्ध योजना तैयार करने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन हजारों पूर्व सैनिकों के लिए एक बड़ी राहत है जो वर्षों से अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।