लाइव भारत समाचार में आपका स्वागत है

Livebharatsamachar ग्राउंड रिपोर्ट: जिनेवा में आयोजित महत्वपूर्ण वैश्विक स्वास्थ्य बैठकों के दौरान भारत ने महामारी की रोकथाम और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह पुरजोर मांग उठाई है कि जब विभिन्न देशों द्वारा साझा किए गए रोगजनकों (पैथोजन) के आधार पर जीवन रक्षक टीके, दवाएं और चिकित्सा उपकरण तैयार किए जाएं, तो उन पर विकासशील और गरीब देशों का भी समान अधिकार होना चाहिए। भारत का यह कड़ा संदेश वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है, क्योंकि वर्तमान में अमीर और विकसित देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों का एकाधिकार इन अत्याधुनिक तकनीकों और टीकों पर बना रहता है, जिससे महामारी के दौर में वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देशों को भारी संघर्ष करना पड़ता है।

ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)

घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)

पिछले कुछ हफ्तों से जिनेवा स्थित मुख्यालयों में वैश्विक महामारी संधि और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमों (IHR) में संशोधन को लेकर मैराथन बैठकें चल रही हैं। इन वार्ताओं के दौरान विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने हित रखे। शुरुआती दौर में विकसित देशों का जोर केवल पैथोजन के त्वरित डिजिटल और भौतिक आदान-प्रदान पर था, ताकि वे अपने यहां रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को तुरंत तेज कर सकें। हालांकि, इस व्यवस्था में यह प्रावधान स्पष्ट नहीं था कि जब उन सैंपल्स के आधार पर कोई सफल टीका या एंटीवायरल ड्रग तैयार होगी, तो उसे किस कीमत पर और कैसे उन देशों को उपलब्ध कराया जाएगा जहां से वे सैंपल लिए गए थे।

इस स्थिति को भांपते हुए भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने कड़ा रुख अपनाया। भारत ने तर्क दिया कि यदि जैविक संसाधन और पैथोजन वैश्विक दक्षिण के देशों से लिए जा रहे हैं, तो उससे बनने वाले उत्पादों पर केवल चुनिंदा फार्मा कंपनियों का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। भारत ने यह भी याद दिलाया कि कोविड-19 महामारी के शुरुआती दिनों में टीकों की जमाखोरी और असमान वितरण के कारण किस तरह विकासशील देशों में लाखों बेकसूर लोगों की जान चली गई थी। इस ऐतिहासिक अन्याय से सबक लेते हुए भारत ने नई संधि में अनिवार्य लाभ-साझाकरण (Benefit-Sharing) तंत्र स्थापित करने की मांग की है।

प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)

भारत के इस मुखर रुख के बाद वैश्विक स्तर पर एक नई बहस छिड़ गई है। अफ्रीकी देशों, लैटिन अमेरिका और कई एशियाई राष्ट्रों ने भारत के इस प्रस्ताव का खुला समर्थन किया है। इन देशों का मानना है कि यदि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को वास्तव में समावेशी बनाना है, तो बौद्धिक संपदा अधिकारों में आपातकालीन छूट का प्रावधान होना ही चाहिए। दूसरी ओर, अमेरिका और यूरोपीय संघ के कुछ देशों की फार्मा लॉबी ने इस पर चिंता व्यक्त की है, उनका तर्क है कि यदि पेटेंट नियमों में ढील दी गई, तो भविष्य के अनुसंधान और विकास (R&D) के लिए मिलने वाला निवेश प्रभावित हो सकता है।

भारतीय कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, हम न्यायसंगत और पारदर्शी स्वास्थ्य व्यवस्था के पक्ष में हैं। भविष्य की किसी भी महामारी से निपटने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि टीकों और दवाओं के वितरण में किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो और हर जरूरतमंद देश तक जीवन रक्षक तकनीक समय पर पहुंचे।

आगे क्या? (What Lies Ahead)

आने वाले महीनों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य देशों के बीच इस संधि को अंतिम रूप देने के लिए कई दौर की और बैठकें होनी हैं। भारत अपनी इस मांग पर पूरी तरह अडिग है कि लाभ-साझाकरण और समान पहुंच के बिना कोई भी वैश्विक महामारी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। यदि भारत अपने इस कूटनीतिक प्रयास में सफल रहता है, तो यह वैश्विक स्वास्थ्य इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा, जिससे भविष्य के संकटों में गरीब और विकासशील देशों को समय पर और किफायती इलाज मिल सकेगा।

रविवार, 27 सितम्बर , 2026

वैश्विक मंच पर भारत की दोटूक मांग, साझा किए गए रोगजनकों से बने टीकों और दवाओं तक हो सभी की समान पहुंच

Livebharatsamachar ग्राउंड रिपोर्ट: जिनेवा में आयोजित महत्वपूर्ण वैश्विक स्वास्थ्य बैठकों के दौरान भारत ने महामारी की रोकथाम और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह पुरजोर मांग उठाई है कि जब विभिन्न देशों द्वारा साझा किए गए रोगजनकों (पैथोजन) के आधार पर जीवन रक्षक टीके, दवाएं और चिकित्सा उपकरण तैयार किए जाएं, तो उन पर विकासशील और गरीब देशों का भी समान अधिकार होना चाहिए। भारत का यह कड़ा संदेश वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है, क्योंकि वर्तमान में अमीर और विकसित देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों का एकाधिकार इन अत्याधुनिक तकनीकों और टीकों पर बना रहता है, जिससे महामारी के दौर में वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देशों को भारी संघर्ष करना पड़ता है।

ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)

  • भारत ने साझा किए गए पैथोजन से विकसित होने वाले टीकों और दवाओं तक निष्पक्ष और सस्ती पहुंच की जोरदार वकालत की है।
  • विकसित देशों द्वारा ग्लोबल साउथ के देशों के साथ स्वास्थ्य तकनीक साझा न करने की नीति पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है।
  • महामारी की रोकथाम और संधि पर चल रही वार्ताओं के दौरान बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) में नरमी बरतने की मांग की गई है।
  • भारत ने स्पष्ट किया है कि भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए वैश्विक एकजुटता और पारदर्शी डेटा शेयरिंग अनिवार्य शर्त है।

घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)

पिछले कुछ हफ्तों से जिनेवा स्थित मुख्यालयों में वैश्विक महामारी संधि और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमों (IHR) में संशोधन को लेकर मैराथन बैठकें चल रही हैं। इन वार्ताओं के दौरान विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने हित रखे। शुरुआती दौर में विकसित देशों का जोर केवल पैथोजन के त्वरित डिजिटल और भौतिक आदान-प्रदान पर था, ताकि वे अपने यहां रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को तुरंत तेज कर सकें। हालांकि, इस व्यवस्था में यह प्रावधान स्पष्ट नहीं था कि जब उन सैंपल्स के आधार पर कोई सफल टीका या एंटीवायरल ड्रग तैयार होगी, तो उसे किस कीमत पर और कैसे उन देशों को उपलब्ध कराया जाएगा जहां से वे सैंपल लिए गए थे।

इस स्थिति को भांपते हुए भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने कड़ा रुख अपनाया। भारत ने तर्क दिया कि यदि जैविक संसाधन और पैथोजन वैश्विक दक्षिण के देशों से लिए जा रहे हैं, तो उससे बनने वाले उत्पादों पर केवल चुनिंदा फार्मा कंपनियों का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। भारत ने यह भी याद दिलाया कि कोविड-19 महामारी के शुरुआती दिनों में टीकों की जमाखोरी और असमान वितरण के कारण किस तरह विकासशील देशों में लाखों बेकसूर लोगों की जान चली गई थी। इस ऐतिहासिक अन्याय से सबक लेते हुए भारत ने नई संधि में अनिवार्य लाभ-साझाकरण (Benefit-Sharing) तंत्र स्थापित करने की मांग की है।

प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)

भारत के इस मुखर रुख के बाद वैश्विक स्तर पर एक नई बहस छिड़ गई है। अफ्रीकी देशों, लैटिन अमेरिका और कई एशियाई राष्ट्रों ने भारत के इस प्रस्ताव का खुला समर्थन किया है। इन देशों का मानना है कि यदि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को वास्तव में समावेशी बनाना है, तो बौद्धिक संपदा अधिकारों में आपातकालीन छूट का प्रावधान होना ही चाहिए। दूसरी ओर, अमेरिका और यूरोपीय संघ के कुछ देशों की फार्मा लॉबी ने इस पर चिंता व्यक्त की है, उनका तर्क है कि यदि पेटेंट नियमों में ढील दी गई, तो भविष्य के अनुसंधान और विकास (R&D) के लिए मिलने वाला निवेश प्रभावित हो सकता है।

भारतीय कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, हम न्यायसंगत और पारदर्शी स्वास्थ्य व्यवस्था के पक्ष में हैं। भविष्य की किसी भी महामारी से निपटने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि टीकों और दवाओं के वितरण में किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो और हर जरूरतमंद देश तक जीवन रक्षक तकनीक समय पर पहुंचे।

आगे क्या? (What Lies Ahead)

आने वाले महीनों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य देशों के बीच इस संधि को अंतिम रूप देने के लिए कई दौर की और बैठकें होनी हैं। भारत अपनी इस मांग पर पूरी तरह अडिग है कि लाभ-साझाकरण और समान पहुंच के बिना कोई भी वैश्विक महामारी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। यदि भारत अपने इस कूटनीतिक प्रयास में सफल रहता है, तो यह वैश्विक स्वास्थ्य इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा, जिससे भविष्य के संकटों में गरीब और विकासशील देशों को समय पर और किफायती इलाज मिल सकेगा।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *