Livebharatsamachar एक्सप्लेनर: भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून की आधिकारिक विदाई के साथ ही कृषि और मौसम चक्र को लेकर चिंताएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। भले ही मानसूनी बौछारें थम चुकी हैं, लेकिन प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो (El Nino) का प्रभाव अब भी भारतीय मौसम विज्ञानियों और नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी सिरदर्दी बना हुआ है। इस वैश्विक मौसमी परिघटना के कारण आने वाले महीनों में देश की आबोहवा, सर्दियों के मिजाज और कृषि अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। वर्तमान पूर्वानुमानों के अनुसार, अल नीनो के और अधिक तीव्र होने की संभावना है, जिससे इस बार सामान्य से काफी गर्म सर्दी का सामना करना पड़ सकता है। मानसून सीजन के दौरान देश के कई हिस्सों में दर्ज किए गए बारिश के घाटे ने पहले ही जल संसाधनों और जलाशयों के जलस्तर को लेकर खतरे की घंटी बजा दी है, और अब अल नीनो की सक्रियता इस संकट को और अधिक गंभीर बना सकती है।
5 प्रमुख बातें जो आपको जाननी चाहिए (5 Key Takeaways)
- अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के गर्म होने की एक आवर्तक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो दुनिया भर के मौसम को प्रभावित करती है।
- भारत में इस वर्ष के मानसून सीजन में बारिश की कमी दर्ज की गई थी, जिसका सीधा असर खरीफ फसलों के उत्पादन और भूजल स्तर पर पड़ा है।
- वैज्ञानिकों और मौसम विभाग के ताजा अनुमानों के अनुसार, आने वाले सर्दियों के महीनों में तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया जा सकता है।
- गर्म सर्दियों और नमी की कमी का सीधा असर रबी की प्रमुख फसलों जैसे गेंहू, सरसों और दलहन की पैदावार पर पड़ सकता है।
- जलवायु परिवर्तन के इस दौर में क्षेत्रीय स्तर पर चरम मौसमी घटनाएं देखने को मिल सकती हैं, जिसमें सूखे से लेकर बाढ़ तक की स्थिति शामिल है।
मामला क्या है? (Understanding the Core Issue)
अल नीनो एक ऐसी जलवायु संबंधी घटना है जो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने से उत्पन्न होती है। इसका सीधा और गहरा प्रभाव भारतीय मानसून और सर्दियों के तापमान पर पड़ता है। सामान्य वर्षों में मानसून भारत के कृषि क्षेत्र के लिए जीवन रेखा साबित होता है, क्योंकि देश का एक बड़ा कृषि क्षेत्र आज भी मानसूनी बारिश पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर करता है। हालांकि, इस बार मानसून के दौरान बारिश का वितरण काफी असमान रहा। देश के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात बने रहे, तो कुछ क्षेत्रों में अचानक और भारी बारिश ने फसलों को तबाह कर दिया। मानसून के जाने के बाद अब अल नीनो के प्रभाव के चलते सर्दियों के महीनों में भी मौसम का असामान्य मिजाज देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि तापमान में वृद्धि न केवल इंसानी सेहत को प्रभावित करेगी, बल्कि यह मिट्टी की नमी को भी तेजी से सुखाएगी, जिससे पौधों के विकास में बाधा उत्पन्न होगी। कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार, यदि सर्दियों में पर्याप्त ठंड नहीं पड़ी, तो रबी फसलों के लिए आवश्यक किशोरावस्था का तापमान नहीं मिल पाएगा, जिसका असर कुल खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा।
मुख्य कारण और वजहें (Root Causes)
अल नीनो की तीव्रता के पीछे वैश्विक जलवायु प्रणाली में आ रहे बड़े बदलाव और समुद्र के तापमान में लगातार हो रही वृद्धि प्रमुख कारण हैं। समुद्र की सतह का गर्म होना वायुमंडलीय दबाव में बदलाव लाता है, जिससे मानसूनी हवाओं की दिशा और गति प्रभावित होती है। इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव ने इन प्राकृतिक चक्रों को और अधिक अनिश्चित बना दिया है। भारत के संदर्भ में, भूजल का अत्यधिक दोहन और वर्षा जल संचयन के प्रति उदासीनता ने इस समस्या को और विकट कर दिया है। जब मानसून कमजोर होता है और अल नीनो जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो जल संरक्षण की कमी के कारण कृषि क्षेत्र तुरंत प्रभावित हो जाता है। विभिन्न राज्यों में सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता इतनी अधिक है कि मानसून की विफलता या बेमौसम गर्मी सीधे तौर पर कृषि संकट को जन्म देती है। इसके साथ ही, अल नीनो के कारण जेट स्ट्रीम और पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) के पैटर्न में भी बदलाव आ रहा है, जो सर्दियों में उत्तर भारत में होने वाली बारिश और ठंड को नियंत्रित करते हैं।
भारतीय कृषि प्रणाली और मौसम चक्र इस समय एक बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। अल नीनो का प्रभाव केवल तापमान वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। आने वाले महीनों में किसानों को जलवायु-अनुकूल खेती अपनाने और पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल पर विशेष ध्यान देना होगा।
निष्कर्ष और आगे का रास्ता (Conclusion & Outlook)
अंततः, यह स्पष्ट है कि मानसून के जाने के बाद भी भारतीय मौसम की अनिश्चितताएं समाप्त नहीं हुई हैं। अल नीनो का प्रभाव आने वाले महीनों में देश की अर्थव्यवस्था, विशेषकर कृषि क्षेत्र की परीक्षा लेगा। इस परिस्थिति से निपटने के लिए सरकार, वैज्ञानिकों और किसानों को मिलकर एक मजबूत और दूरदर्शी रणनीति तैयार करनी होगी। जल संचयन संरचनाओं को मजबूत करना, सूखे से लड़ने वाली फसलों के बीजों का विकास करना और मौसम पूर्व चेतावनी प्रणाली को और अधिक सटीक बनाना समय की सबसे बड़ी मांग है। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो यह मौसमी बदलाव देश के अन्नदाताओं और समग्र खाद्य सुरक्षा के लिए भारी पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन के इस युग में सतर्कता और अनुकूलन ही एकमात्र विकल्प है।