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Livebharatsamachar: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में लंबे समय से लंबित सुधारों की प्रक्रिया के बीच भारत ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी मुखर और स्पष्ट स्थिति दर्ज कराई है। भारत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के किसी भी नए और सुधरे हुए स्वरूप में वीटो के अधिकार को केवल पांच स्थायी सदस्यों (P5) तक सीमित नहीं रखा जा सकता है। भारत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता और उनकी कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। आधुनिक भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दरकिनार करते हुए पुरानी व्यवस्था को ढोना अब वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। भारत ने यह भी रेखांकित किया है कि यदि वैश्विक निकाय को इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटना है, तो इसकी निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और व्यापक लोकतांत्रिक मूल्यों को शामिल करना अनिवार्य हो गया है।

मुख्य बिंदु एवं हाइलाइट्स (Key Highlights)

विस्तृत समाचार एवं पूरा घटनाक्रम (Detailed Report)

संयुक्त राष्ट्र के सुधार एजेंडे पर चर्चा के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने वैश्विक व्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों की आवश्यकता पर बल दिया। वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद की भू-राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाती है। उस दौर के शक्ति समीकरण और आज की बहुध्रुवीय दुनिया की वास्तविकताओं में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। भारत ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वीटो का अधिकार केवल कुछ गिने-चुने देशों के हाथ में केंद्रित रखना आज के वैश्विक परिदृश्य में पूरी तरह से प्रासंगिकता खो चुका है। विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की आवाज को लगातार दबाया जाना अब और अधिक स्वीकार्य नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर का दुरुपयोग अतीत में कई बड़े वैश्विक संकटों के समाधान में बाधा बना है। जब तक वीटो के विशेषाधिकार को लोकतांत्रिक नहीं बनाया जाता या इसका दायरा बढ़ाया नहीं जाता, तब तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक और शांतिप्रिय देशों की भूमिका को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। भारत ने हमेशा से यह तर्क दिया है कि दुनिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले देशों को निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था में उचित स्थान मिलना ही चाहिए। सुरक्षा परिषद के सुधारों पर अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) में प्रगति की गति बेहद धीमी रही है, जिस पर भारत ने बार-बार गहरी निराशा व्यक्त की है और प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने की मांग की है।

भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए एक अटकी हुई और पुरानी व्यवस्था काम नहीं आ सकती। यदि संयुक्त राष्ट्र को अपनी विश्वसनीयता बचाए रखनी है, तो सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार अनिवार्य हैं और वीटो अधिकार का एकाधिकार खत्म होना ही चाहिए।

भविष्य का असर एवं निष्कर्ष (Future Impact & Conclusion)

भारत का यह कड़ा रुख आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों पर चल रही वैश्विक बहसों को एक नई दिशा देगा। जैसे-जैसे दुनिया बहुध्रुवीय होती जा रही है, वैसे-वैसे पारंपरिक महाशक्तियों पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे अपनी नीतियों में बदलाव करें और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को उचित हिस्सेदारी दें। यदि सुधारों की प्रक्रिया में वीटो पावर के मुद्दे पर कोई ठोस सहमति नहीं बनती है, तो संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर वैश्विक स्तर पर और अधिक सवाल उठेंगे। अंततः, वैश्विक शांति, सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए एक समावेशी, प्रतिनिधि और पारदर्शी सुरक्षा परिषद का गठन ही एकमात्र विकल्प बचता है, जिसमें भारत की केंद्रीय भूमिका अपरिहार्य है।

बुधवार, 28 अक्टूबर , 2026

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार पर भारत की दो टूक, वीटो पावर केवल पांच देशों तक सीमित नहीं रह सकती

Livebharatsamachar: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में लंबे समय से लंबित सुधारों की प्रक्रिया के बीच भारत ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी मुखर और स्पष्ट स्थिति दर्ज कराई है। भारत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के किसी भी नए और सुधरे हुए स्वरूप में वीटो के अधिकार को केवल पांच स्थायी सदस्यों (P5) तक सीमित नहीं रखा जा सकता है। भारत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता और उनकी कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। आधुनिक भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दरकिनार करते हुए पुरानी व्यवस्था को ढोना अब वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। भारत ने यह भी रेखांकित किया है कि यदि वैश्विक निकाय को इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटना है, तो इसकी निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और व्यापक लोकतांत्रिक मूल्यों को शामिल करना अनिवार्य हो गया है।

मुख्य बिंदु एवं हाइलाइट्स (Key Highlights)

  • भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों को लेकर अपनी पुरजोर वकालत की है।
  • वीटो पावर के अधिकार को केवल पांच स्थायी सदस्यों (P5) तक सीमित रखने के विचार का पुरजोर विरोध किया गया है।
  • भारत का मानना है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) की अनदेखी कर किसी भी सुधार को वास्तविक नहीं माना जा सकता।
  • सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली में आधुनिक दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना समय की सबसे बड़ी मांग है।
  • अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को स्थायी सदस्यता देने के समर्थन में दुनिया के कई बड़े देश लगातार अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।

विस्तृत समाचार एवं पूरा घटनाक्रम (Detailed Report)

संयुक्त राष्ट्र के सुधार एजेंडे पर चर्चा के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने वैश्विक व्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों की आवश्यकता पर बल दिया। वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद की भू-राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाती है। उस दौर के शक्ति समीकरण और आज की बहुध्रुवीय दुनिया की वास्तविकताओं में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। भारत ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वीटो का अधिकार केवल कुछ गिने-चुने देशों के हाथ में केंद्रित रखना आज के वैश्विक परिदृश्य में पूरी तरह से प्रासंगिकता खो चुका है। विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की आवाज को लगातार दबाया जाना अब और अधिक स्वीकार्य नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर का दुरुपयोग अतीत में कई बड़े वैश्विक संकटों के समाधान में बाधा बना है। जब तक वीटो के विशेषाधिकार को लोकतांत्रिक नहीं बनाया जाता या इसका दायरा बढ़ाया नहीं जाता, तब तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक और शांतिप्रिय देशों की भूमिका को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। भारत ने हमेशा से यह तर्क दिया है कि दुनिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले देशों को निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था में उचित स्थान मिलना ही चाहिए। सुरक्षा परिषद के सुधारों पर अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) में प्रगति की गति बेहद धीमी रही है, जिस पर भारत ने बार-बार गहरी निराशा व्यक्त की है और प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने की मांग की है।

भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए एक अटकी हुई और पुरानी व्यवस्था काम नहीं आ सकती। यदि संयुक्त राष्ट्र को अपनी विश्वसनीयता बचाए रखनी है, तो सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार अनिवार्य हैं और वीटो अधिकार का एकाधिकार खत्म होना ही चाहिए।

भविष्य का असर एवं निष्कर्ष (Future Impact & Conclusion)

भारत का यह कड़ा रुख आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों पर चल रही वैश्विक बहसों को एक नई दिशा देगा। जैसे-जैसे दुनिया बहुध्रुवीय होती जा रही है, वैसे-वैसे पारंपरिक महाशक्तियों पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे अपनी नीतियों में बदलाव करें और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को उचित हिस्सेदारी दें। यदि सुधारों की प्रक्रिया में वीटो पावर के मुद्दे पर कोई ठोस सहमति नहीं बनती है, तो संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर वैश्विक स्तर पर और अधिक सवाल उठेंगे। अंततः, वैश्विक शांति, सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए एक समावेशी, प्रतिनिधि और पारदर्शी सुरक्षा परिषद का गठन ही एकमात्र विकल्प बचता है, जिसमें भारत की केंद्रीय भूमिका अपरिहार्य है।

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