Livebharatsamachar ग्राउंड रिपोर्ट: भारत में आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण योजनाओं के बीच आर्थिक असमानता का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश में अत्यधिक गरीबी के स्तर में उल्लेखनीय और ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है, जो कि देश के करोड़ों नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार का संकेत देती है। हालांकि, इसी रिपोर्ट का दूसरा पहलू यह भी उजागर करता है कि देश के भीतर धन का संकेंद्रण किस प्रकार हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, देश की शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी की कमाई सबसे निचले 10 प्रतिशत हिस्से की तुलना में लगभग 13 गुना अधिक है। यह गहरी होती आर्थिक खाई देश के नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और आम जनता के बीच गंभीर मंथन का विषय बन गई है, जहां एक तरफ विकास के दावों की सराहना हो रही है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती असमानता को पाटने के लिए ठोस रणनीतियों की मांग उठाई जा रही है।
ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)
- विश्व बैंक की रिपोर्ट में भारत में अत्यधिक गरीबी में तेज गिरावट की पुष्टि की गई है।
- देश की शीर्ष 10% आबादी की आय सबसे निचले 10% वर्ग से 13 गुना अधिक है।
- आर्थिक विकास के साथ-साथ संपत्ति के वितरण में असमानता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
- सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) ने निचले तबके को कुछ राहत पहुंचाई है।
- अर्थशास्त्रियों का मानना है कि समावेशी विकास (Inclusive Growth) के बिना असमानता की इस खाई को पाटना कठिन होगा।
घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)
पिछले कुछ वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था ने वैश्विक स्तर पर विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मजबूत रिकवरी दिखाई है। कोविड-19 महामारी के झटकों के बाद देश के विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई। विश्व बैंक द्वारा जारी ताजा आंकड़े इसी लंबी अवधि की रिकवरी और विकास के पैमानों का विश्लेषण करते हैं। रिपोर्ट के शुरुआती अध्यायों में यह दर्शाया गया है कि भारत ने कैसे लक्षित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से अत्यधिक गरीबी की रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी की है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना और विभिन्न ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों ने इसमें केंद्रीय भूमिका निभाई है।
हालांकि, जैसे-जैसे रिपोर्ट के विश्लेषण आगे बढ़ते हैं, धन के वितरण में असमानता का गंभीर चित्र सामने आता है। आंकड़ों के अनुसार, शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में उच्च आय वर्ग ने अपनी संपत्ति और आय में तीव्र वृद्धि दर्ज की है, जबकि असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और छोटे किसानों की आय उस अनुपात में नहीं बढ़ पाई है। तकनीकी प्रगति, सेवा क्षेत्र के विस्तार और शेयर बाजार में तेजी ने उच्च वर्ग को अधिक लाभान्वित किया है, जबकि निचले तबके के लिए महंगाई और रोजगार के सीमित अवसर अभी भी बड़ी बाधाएं बने हुए हैं। यही कारण है कि देश की कुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा कुछ गिने-चुने हाथों में केंद्रित होता जा रहा है।
प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों और प्रशासनिक हलकों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। सरकारी प्रतिनिधियों का तर्क है कि भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में विकास की प्रक्रिया बहुस्तरीय होती है और गरीबी उन्मूलन हमेशा से सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। सरकार का यह भी कहना है कि बुनियादी ढांचे के विकास और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के जरिए वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया गया है, जिससे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक लाभ पहुंच रहा है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों और श्रम संगठनों ने इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि केवल चुनिंदा पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है।
हम देश से गरीबी को लगातार कम करने में सफल रहे हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी हमारी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है कि विकास का फल समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुंचे और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए जाएं।
स्थानीय बाजारों और ग्रामीण इलाकों में आम नागरिकों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में दो वक्त की रोटी का इंतजाम तो हो जाता है, लेकिन बच्चों की उच्च शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च उठाना अभी भी एक बड़े संघर्ष जैसा है। लोगों का मानना है कि विकास के बड़े आंकड़े तब तक बेमानी हैं जब तक आम आदमी की क्रय शक्ति में वास्तविक सुधार न हो।
आगे क्या? (What Lies Ahead)
भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि नीति निर्माताओं के लिए अब केवल गरीबी कम करना ही काफी नहीं होगा, बल्कि ‘समतामूलक विकास’ को सुनिश्चित करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भारी निवेश की आवश्यकता है ताकि निचले तबके के युवा आधुनिक अर्थव्यवस्था की मांग के अनुसार खुद को ढाल सकें। इसके अलावा, कर सुधारों, श्रम कल्याण कानूनों और सामाजिक सुरक्षा के दायरे को और अधिक व्यापक बनाने पर जोर दिया जा रहा है। यदि इन मोर्चों पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आर्थिक विकास के यह शानदार आंकड़े सामाजिक असंतोष का कारण बन सकते हैं। आने वाले समय में सरकार को बजट और आर्थिक नीतियों में इस असमानता को पाटने के लिए विशेष प्रावधान करने होंगे।