Livebharatsamachar ग्राउंड रिपोर्ट: राजस्थान में आगामी स्थानीय निकाय चुनावों की मतदाता सूचियों को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला विवाद सामने आया है। राज्य के राजनीतिक गलियारों और नागरिक संगठनों में इस बात को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही है कि स्थानीय निकाय चुनाव की वोटर लिस्ट और चुनाव आयोग की अंतिम मतदाता सूची के आंकड़ों में भारी विसंगति पाई गई है। इस गंभीर मुद्दे को उठाते हुए प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने राज्य निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि स्थानीय निकाय चुनावों के लिए आयोग अभी भी जनवरी 2025 की पुरानी और आउटडेटेड मतदाता सूची का उपयोग कर रहा है, जो कि पूरी तरह से अविश्वसनीय और त्रुटिपूर्ण है। इस विसंगति के कारण लाखों पात्र मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित हो सकते हैं, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर भी आंच आ रही है।
ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)
- स्थानीय निकाय चुनावों की वोटर लिस्ट में भारत निर्वाचन आयोग की अंतिम सूची की तुलना में लगभग 30 लाख मतदाता अधिक दर्ज हैं।
- राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जनवरी 2025 की पुरानी मतदाता सूची का उपयोग किए जाने से आंकड़ों में भारी अंतर देखा जा रहा है।
- लगभग 44.28 लाख नामों के हटने और नए नाम जुड़ने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठ रहे हैं।
- सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने इस तकनीकी विसंगति की तत्काल उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब विभिन्न नागरिक मंचों और चुनाव विशेषज्ञों ने राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों के लिए जारी की गई मतदाता सूचियों का सूक्ष्म विश्लेषण करना शुरू किया। विश्लेषण के दौरान यह बात सामने आई कि राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाई गई सूची और देश के मुख्य निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची के बीच लगभग 30 लाख मतदाताओं का बड़ा अंतर है। एक तरफ जहां मुख्य चुनाव आयोग की सूची को अधिक अपडेटेड और सटीक माना जा रहा है, वहीं स्थानीय निकाय चुनाव में पुरानी सूचियों के इस्तेमाल से यह अंतर पैदा हुआ है। इस प्रक्रिया के दौरान लगभग 44.28 लाख नामों के विलोपन और नए नामों के समावेशन को लेकर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के आंकड़ों में हेरफेर या अंतर होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक खतरनाक संकेत है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कई स्थानीय संगठनों ने जिला कलेक्टरों और राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर इस विसंगति को तत्काल दूर करने की मांग की है।
प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)
इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद राज्य निर्वाचन आयोग पर दबाव बढ़ गया है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर अभी तक कोई ठोस सफाई सामने नहीं आई है, लेकिन अंदरखाने बैठकों का दौर शुरू हो गया है। स्थानीय जनता और संभावित उम्मीदवारों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि यदि ऐन वक्त पर मतदाता सूचियों को दुरुस्त नहीं किया गया, तो हजारों लोग मतदान से वंचित हो जाएंगे।
निखिल डे ने कहा, ‘यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है कि स्थानीय निकाय चुनावों के लिए एक पुरानी और अविश्वसनीय मतदाता सूची का उपयोग किया जा रहा है। जब हमारे पास अधिक सटीक और हालिया आंकड़े मौजूद हैं, तो चुनाव आयोग को पारदर्शिता बरतनी चाहिए और दोनों सूचियों के बीच के 30 लाख के अंतर को स्पष्ट करना चाहिए।’
आगे क्या? (What Lies Ahead)
आगामी दिनों में यह मामला और अधिक तूल पकड़ सकता है क्योंकि विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार और निर्वाचन आयोग को घेरने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। यदि समय रहते इस विसंगति को दूर नहीं किया गया, तो चुनावी प्रक्रिया की वैधता को अदालत में भी चुनौती दी जा सकती है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि राज्य निर्वाचन आयोग इस बड़े तकनीकी और प्रशासनिक अंतर को पाटने के लिए क्या कदम उठाता है और क्या सभी पात्र मतदाताओं को उनका मताधिकार मिल पाता है या नहीं।