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Livebharatsamachar ब्यूरो: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के 'एडिक्टिव डिजाइन' (लत लगाने वाले डिजाइन) को लेकर एक महत्वपूर्ण सुनवाई में केंद्र सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई है कि कैसे एल्गोरिदम और नोटिफिकेशन के जरिए युवाओं और बच्चों को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का आदी बनाया जा रहा है, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहे हैं।

डिजिटल लत और मानसिक स्वास्थ्य का संकट

अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा अपनाए जा रहे तरीके न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि ये उपयोगकर्ता की मनोवैज्ञानिक स्थिति के साथ खिलवाड़ भी कर रहे हैं। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि 'अनंत स्क्रॉलिंग' (infinite scrolling) और 'पुश नोटिफिकेशन' जैसे फीचर्स का उद्देश्य उपयोगकर्ताओं को लंबे समय तक स्क्रीन से चिपकाए रखना है, जिससे उनकी उत्पादकता और मानसिक शांति प्रभावित हो रही है।

अदालत ने कहा कि तकनीक का उपयोग मानवीय विकास के लिए होना चाहिए, न कि उसे एक ऐसी लत में तब्दील करने के लिए जो समाज के भविष्य यानी युवाओं की एकाग्रता को ही खत्म कर दे।

प्रमुख बिंदु और भविष्य की राह

फिलहाल, केंद्र सरकार को इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अगली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या सोशल मीडिया कंपनियों को अपने डिजाइन में बदलाव करने के लिए मजबूर किया जाएगा या सरकार कोई नया नियामक ढांचा तैयार करेगी।

गुरूवार, 17 सितम्बर , 2026

सोशल मीडिया की लत पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा जवाब

Livebharatsamachar ब्यूरो: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के ‘एडिक्टिव डिजाइन’ (लत लगाने वाले डिजाइन) को लेकर एक महत्वपूर्ण सुनवाई में केंद्र सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई है कि कैसे एल्गोरिदम और नोटिफिकेशन के जरिए युवाओं और बच्चों को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का आदी बनाया जा रहा है, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहे हैं।

डिजिटल लत और मानसिक स्वास्थ्य का संकट

अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा अपनाए जा रहे तरीके न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि ये उपयोगकर्ता की मनोवैज्ञानिक स्थिति के साथ खिलवाड़ भी कर रहे हैं। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि ‘अनंत स्क्रॉलिंग’ (infinite scrolling) और ‘पुश नोटिफिकेशन’ जैसे फीचर्स का उद्देश्य उपयोगकर्ताओं को लंबे समय तक स्क्रीन से चिपकाए रखना है, जिससे उनकी उत्पादकता और मानसिक शांति प्रभावित हो रही है।

अदालत ने कहा कि तकनीक का उपयोग मानवीय विकास के लिए होना चाहिए, न कि उसे एक ऐसी लत में तब्दील करने के लिए जो समाज के भविष्य यानी युवाओं की एकाग्रता को ही खत्म कर दे।

प्रमुख बिंदु और भविष्य की राह

  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम की पारदर्शिता पर सवाल।
  • युवाओं और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए कड़े नियमों की आवश्यकता।
  • केंद्र सरकार को यह बताना होगा कि क्या इन प्लेटफॉर्म्स को नियंत्रित करने के लिए कोई विशेष नीति बनाई जा रही है।
  • डिजिटल वेलबीइंग को बढ़ावा देने के लिए तकनीकी बदलावों पर जोर।

फिलहाल, केंद्र सरकार को इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अगली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या सोशल मीडिया कंपनियों को अपने डिजाइन में बदलाव करने के लिए मजबूर किया जाएगा या सरकार कोई नया नियामक ढांचा तैयार करेगी।

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