Livebharatsamachar ब्यूरो: कानूनी लड़ाई में सीसीटीवी फुटेज को सबसे पुख्ता सबूत माना जाता है, लेकिन इसे समय रहते हासिल करना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले ने सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए सीसीटीवी फुटेज हासिल करने की प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना दिया है, जिससे आम नागरिकों और कानूनी विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
समय का खेल: फुटेज मिटने का खतरा
ज्यादातर सीसीटीवी सिस्टम में स्टोरेज की क्षमता सीमित होती है। आमतौर पर, डेटा को 15 से 30 दिनों के भीतर ओवरराइट कर दिया जाता है। यदि पीड़ित या वादी समय रहते फुटेज को सुरक्षित करने का अनुरोध नहीं करता, तो महत्वपूर्ण साक्ष्य हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि तकनीकी रूप से डेटा डिलीट होने की गति और कानूनी प्रक्रिया की धीमी चाल के बीच का तालमेल बिठाना सबसे बड़ी बाधा है।
हाईकोर्ट के फैसले का प्रभाव
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सीसीटीवी फुटेज को आरटीआई के दायरे में लाने की प्रक्रिया सीधी नहीं है। कोर्ट के इस रुख के बाद अब फुटेज प्राप्त करने के लिए कानूनी दांव-पेच और अधिक बढ़ गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अब आरटीआई पर निर्भर रहने के बजाय सीधे पुलिस या संबंधित प्राधिकरण को ‘प्रिजर्वेशन नोटिस’ भेजना ही एकमात्र विकल्प बचा है।
कानूनी विशेषज्ञों का सुझाव है कि किसी भी घटना के तुरंत बाद संबंधित संस्थान को एक औपचारिक पत्र भेजकर डेटा को सुरक्षित रखने का अनुरोध करना चाहिए, ताकि बाद में कानूनी प्रक्रिया के दौरान साक्ष्य उपलब्ध रह सके।
साक्ष्य सुरक्षित रखने के मुख्य उपाय
- घटना के तुरंत बाद संबंधित विभाग को लिखित सूचना दें।
- फुटेज को ओवरराइट होने से बचाने के लिए ‘प्रिजर्वेशन रिक्वेस्ट’ दर्ज करें।
- कानूनी सलाह लेकर कोर्ट के माध्यम से फुटेज की मांग करें।
- संबंधित सीसीटीवी ऑपरेटर या संस्थान से डेटा को सुरक्षित रखने की पुष्टि लें।
अंततः, डिजिटल साक्ष्य की दुनिया में ‘समय’ ही सबसे बड़ा कारक है। यदि फुटेज को समय रहते सुरक्षित नहीं किया गया, तो न्याय की राह में यह एक बड़ी बाधा साबित हो सकती है।