Livebharatsamachar संवाददाता: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा के मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ अपनी मुखर और स्पष्ट नीति को दोहराते हुए भारत ने एक बार फिर वैश्विक समुदाय को झकझोर दिया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह पुरजोर मांग उठाई है कि आतंकवाद के वे कृत्य, जो एक निश्चित गंभीरता और भयावहता के स्तर को पार कर जाते हैं, उन्हें औपचारिक रूप से ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ (Crimes Against Humanity) के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। भारत का मानना है कि आतंकवाद अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी मानवता के अस्तित्व के लिए एक असाधारण और लाइलाज खतरा बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधियों ने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक आतंकवाद विरोधी कानूनों में मौजूद कमियों और विसंगतियों का फायदा उठाकर आतंकी संगठन और उनके मददगार देश बच निकलते हैं, जिसे रोकने के लिए अब एक कठोर और एकीकृत वैश्विक परिभाषा व कानूनी ढांचे की सख्त जरूरत है।
ताज़ा अपडेट्स और मुख्य बिंदु (Fresh Updates)
- संयुक्त राष्ट्र के उच्च स्तरीय मंच पर भारत ने आतंकवाद की नई और आधुनिक परिभाषा को वैश्विक स्तर पर स्वीकार करने का आह्वान किया है।
- भारत ने दो टूक कहा कि जो आतंकवादी हमले बड़े पैमाने पर नागरिकों को निशाना बनाते हैं और सामूहिक हिंसा फैलाते हैं, उन्हें मानवता के खिलाफ गंभीर अपराध माना जाना चाहिए।
- भारतीय कूटनीतिक दल ने वैश्विक आतंकवाद विरोधी समझौतों (Comprehensive Convention on International Terrorism – CCIT) को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने पर जोर दिया है।
- बैठक के दौरान कुछ देशों द्वारा आतंकवादियों को दी जा रही पनाह और वित्तीय मदद के दोहरे मानदंडों पर भी कड़ा प्रहार किया गया।
विस्तार से समझें पूरा मामला (In-Depth Explanation)
वैश्विक कूटनीति के इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब भारत ने आतंकवाद के खात्मे के लिए वैश्विक एकजुटता की वकालत की हो, लेकिन इस बार भारत का यह रुख बेहद कानूनी और लक्षित है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने विस्तार से बताया कि कैसे आज के दौर में आतंकवादी संगठन अत्याधुनिक तकनीक, सोशल मीडिया, क्रिप्टोकरेंसी और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्र का दुरुपयोग कर रहे हैं। जब तक आतंकवाद को केवल एक साधारण आपराधिक कृत्य या स्थानीय कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा जाएगा, तब तक इसके अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जा सकता। भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों में एक विशेष धारा या स्पष्ट वैश्विक समझौते की मांग की है जिसके तहत सीमा पार आतंकवाद (Cross-border Terrorism) और प्रायोजित आतंकवाद को मानवता के खिलाफ सीधा अपराध घोषित किया जाए। इस कदम से ऐसे देशों पर भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव बनेगा जो परोक्ष रूप से या प्रत्यक्ष रूप से आतंकवादियों को शरण, प्रशिक्षण और वित्तीय संसाधन मुहैया कराते हैं। भारतीय राजनयिकों ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद और मानवता एक साथ नहीं चल सकते। जो लोग निर्दोष नागरिकों की बेरहमी से हत्या करते हैं, वे किसी भी मानवाधिकार या कूटनीतिक रियायत के हकदार नहीं हैं। भारत की इस मांग का कई विकासशील देशों ने समर्थन भी किया है जो खुद आतंकवाद के दर्द को झेल चुके हैं।
सामाजिक व आर्थिक प्रभाव (Social & Economic Impact)
आतंकवाद का सीधा असर न केवल किसी देश की राजनीतिक स्थिरता पर पड़ता है, बल्कि यह समाज के ताने-बाने और अर्थव्यवस्था को भी अंदर से खोखला कर देता है। जब आतंकी हमलों को मानवता के खिलाफ अपराध के रूप में वैश्विक मान्यता मिलेगी, तो अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों (International Courts) और वैश्विक संस्थाओं के पास ऐसे अपराधियों और उनके आकाओं के खिलाफ सख्त प्रतिबंध लगाने, उनकी संपत्ति जब्त करने और उन्हें वैश्विक मंच पर पूरी तरह अलग-थलग करने के लिए पुख्ता कानूनी आधार होगा। आर्थिक मोर्चे पर, आतंकवाद के कारण पर्यटन, विदेशी निवेश, और बुनियादी ढांचे का विकास बुरी तरह प्रभावित होता है। एक सुरक्षित और आतंकवाद-मुक्त वैश्विक माहौल ही सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने की एकमात्र कुंजी है। इसके अलावा, इसका सामाजिक प्रभाव यह होगा कि आतंकवाद के पीड़ितों को न्याय मिलने की प्रक्रिया तेज होगी और दुनिया भर के समाजों में शांति तथा सद्भाव का संदेश जाएगा।
भारत का यह स्पष्ट रुख है कि आतंकवाद के मामले में कोई ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ आतंकवादी नहीं होता। मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में आने वाले ऐसे कृत्यों के लिए वैश्विक समुदाय को अपनी संकीर्ण भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं से ऊपर उठकर एक मजबूत और अडिग कानूनी ढांचा तैयार करना ही होगा।
संक्षिप्त निष्कर्ष (Summary & Outlook)
संयुक्त राष्ट्र में भारत द्वारा उठाई गई यह आवाज वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। आतंकवाद को मानवता के खिलाफ अपराध के रूप में स्थापित करने की यह पहल दुनिया भर के लोकतांत्रिक और शांतिप्रिय देशों को एक मंच पर लाने का काम करेगी। अब समय आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र और उसके सदस्य देश दोहरे मानदंडों को त्यागकर इस गंभीर प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करें और आतंकवाद के खात्मे के लिए ठोस, निर्णायक और कानूनी रूप से बाध्यकारी कदम उठाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस दानव से सुरक्षित रखा जा सके।