1983 में कुछ शिवभक्तों से शुरू हुई कांवड़ यात्रा आज बन चुकी है लाखों श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था का विराट संगम

अयोध्या के नागेश्वरनाथ से बस्ती के बाबा भदेश्वरनाथ धाम तक हर सावन गूंजता है ‘बोल बम’

महंत नंदानाथ उर्फ नंदा बाबा ने रखी थी ऐतिहासिक यात्रा की नींव, चार दशक में सेवा, सुरक्षा और सामाजिक सहभागिता का बना अद्भुत उदाहरण

बस्ती, 10 अगस्त। लाइव भारत समाचार ब्यूरो।
उत्तर प्रदेश के धार्मिक मानचित्र पर बस्ती का बाबा भदेश्वरनाथ धाम सदियों से शिवभक्ति और आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। सावन के पवित्र महीने में जब अयोध्या की पावन सरयू नदी से जल लेकर लाखों कदम भदेश्वरनाथ धाम की ओर बढ़ते हैं, तब पूरा मार्ग शिवमय हो उठता है। कांवड़ियों के कंठ से निकलता ‘बोल बम’, ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष न केवल धार्मिक वातावरण को भक्तिमय बनाता है, बल्कि अयोध्या और बस्ती के बीच आस्था की एक ऐसी जीवंत कड़ी स्थापित करता है, जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती है।
अयोध्या के प्रसिद्ध नागेश्वरनाथ मंदिर से पवित्र सरयू जल लेकर बाबा भदेश्वरनाथ धाम तक पहुंचने वाली यह ऐतिहासिक कांवड़ यात्रा आज विशाल धार्मिक आयोजन का स्वरूप ले चुकी है। हालांकि इसकी शुरुआत चार दशक से अधिक समय पहले बेहद सीमित संसाधनों और कुछ शिवभक्तों के साथ हुई थी, लेकिन निरंतर बढ़ती श्रद्धा ने इसे उत्तर भारत की प्रमुख धार्मिक यात्राओं में एक विशिष्ट पहचान दिलाई।
1983 में महंत नंदानाथ ने रखी थी यात्रा की नींव
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस ऐतिहासिक कांवड़ यात्रा की विधिवत शुरुआत वर्ष 1983 में महंत नंदानाथ उर्फ नंदा बाबा ने की थी। उस दौर में यात्रा में शामिल होने वाले शिवभक्तों की संख्या बेहद कम थी। सीमित साधनों के बावजूद नंदा बाबा ने श्रद्धालुओं को एकजुट किया और अयोध्या की सरयू से जल लेकर बाबा भदेश्वरनाथ के जलाभिषेक की परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
उस समय न तो आज जैसी व्यापक सुविधाएं थीं और न ही यात्रा के लिए बड़े स्तर पर प्रशासनिक एवं सामाजिक व्यवस्थाएं। श्रद्धा ही सबसे बड़ी शक्ति थी और भगवान शिव के प्रति आस्था ही यात्रा की ऊर्जा।
धीरे-धीरे इस धार्मिक पहल की चर्चा आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगी और हर सावन श्रद्धालुओं का नया कारवां इस यात्रा से जुड़ता गया।
1986 : ट्रॉली पर शिव प्रतिमा और जरूरी सामान लेकर निकला कारवां
यात्रा के विस्तार की दिशा में वर्ष 1986 महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। नंदा बाबा लगभग 50 सहयोगियों के साथ ट्रॉली पर भगवान शिव की प्रतिमा, भोजन सामग्री और यात्रा के लिए आवश्यक सामान लेकर कांवड़ यात्रा में शामिल हुए।
यह पहल केवल यात्रा की सुविधा तक सीमित नहीं रही। इससे लोगों में सामूहिक भागीदारी और सेवा की भावना मजबूत हुई। आसपास के गांवों के श्रद्धालु भी धीरे-धीरे इस धार्मिक यात्रा से जुड़ने लगे।
1990 तक पहुंची संख्या करीब एक हजार
लगातार बढ़ती धार्मिक आस्था का परिणाम यह हुआ कि वर्ष 1990 तक आसपास के गांवों के बड़ी संख्या में श्रद्धालु कांवड़ यात्रा में शामिल होने लगे। उस समय कांवड़ियों की संख्या करीब एक हजार तक पहुंच गई थी।
शुरुआती दौर में यात्रा को पूरा करने में लगभग तीन दिन लगते थे। रास्ते में श्रद्धालु शिव का जयघोष करते हुए आगे बढ़ते और जगह-जगह स्थानीय लोग उनके स्वागत एवं सेवा में जुटते थे।
श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ भोजन, विश्राम, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी व्यवस्थाओं की आवश्यकता भी महसूस होने लगी।
1995 : नंदा बाबा ने संभाली सेवा और व्यवस्था की कमान
वर्ष 1995 यात्रा के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया। कांवड़ियों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। ऐसे में नंदा बाबा ने स्वयं जल लेकर यात्रा करने के बजाय श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और भंडारे की व्यवस्थाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
इस निर्णय ने यात्रा को एक नए संगठनात्मक स्वरूप की दिशा में आगे बढ़ाया। कांवड़ियों की सुविधा के लिए रास्ते में सेवा शिविर और भंडारे बढ़ने लगे तथा स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी मजबूत होती गई।
1996 : बोलबम कांवड़िया धर्मशाला बनी सेवा का केंद्र
वर्ष 1996 में बोलबम कांवड़िया धर्मशाला की स्थापना की गई। नंदा बाबा इसके संरक्षक बने, जबकि पंकज भईया को अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई।
धर्मशाला ने कांवड़ यात्रा से जुड़े श्रद्धालुओं के लिए ठहरने और सेवा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही यात्रा के दौरान आने वाले कांवड़ियों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में संगठित प्रयास शुरू हुए।
यह व्यवस्था आगे चलकर यात्रा की सेवा परंपरा का महत्वपूर्ण आधार बनी।
2000 के बाद बढ़ा दायरा, आसपास के जिलों से जुड़ने लगे श्रद्धालु
वर्ष 2000 के बाद भदेश्वरनाथ कांवड़ यात्रा का विस्तार अयोध्या और बस्ती तक सीमित नहीं रहा। आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा से जुड़ने लगे।
हर वर्ष सावन आते ही कांवड़ियों का विशाल कारवां अयोध्या की सरयू की ओर उमड़ता और वहां से पवित्र जल लेकर बाबा भदेश्वरनाथ धाम की ओर प्रस्थान करता।
श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या ने जहां इस यात्रा की धार्मिक प्रतिष्ठा को बढ़ाया, वहीं यातायात, सुरक्षा और चिकित्सा व्यवस्था को लेकर प्रशासन के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हुईं।
2006 : कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए बदली यातायात व्यवस्था
यात्रा में लगातार बढ़ती भीड़ को देखते हुए वर्ष 2006 में अयोध्या-बस्ती मार्ग पर कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए यातायात व्यवस्था में विशेष बदलाव किए गए।
श्रद्धालुओं की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए यात्रा के दौरान मार्ग को कुछ समय के लिए बंद रखने जैसी व्यवस्थाएं की गईं। इससे कांवड़ियों और सामान्य यातायात के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया।
यह चरण इस बात का प्रमाण था कि धार्मिक आयोजन अब इतने व्यापक स्वरूप में पहुंच चुका था कि उसके लिए विशेष यातायात और सुरक्षा प्रबंधन की आवश्यकता पड़ने लगी थी।
2007 : चिकित्सा शिविर और भंडारे ने बढ़ाई सेवा की परंपरा
वर्ष 2007 में हिंदू युवा वाहिनी की जिला इकाई, जिला अध्यक्ष पंकज के सहयोग और जिला चिकित्सालय के समन्वय से यात्रा मार्ग पर चिकित्सा शिविर लगाने की व्यवस्था शुरू हुई।
कांवड़ियों के लिए चिकित्सा सहायता के साथ-साथ अल्पाहार और भंडारे की व्यवस्था का भी विस्तार हुआ।
इसके बाद विभिन्न सामाजिक संगठनों, स्थानीय नागरिकों, व्यापारियों और सेवा भाव से जुड़े लोगों की भागीदारी लगातार बढ़ती गई। यात्रा धार्मिक आस्था के साथ-साथ सेवा और सामाजिक सहभागिता का बड़ा मंच बनती चली गई।
2008 : कांवड़ यात्रा ने लिया महाआयोजन का विराट रूप
वर्ष 2008 आते-आते बाबा भदेश्वरनाथ कांवड़ यात्रा एक विशाल धार्मिक महाआयोजन का स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी।
चार दशक से अधिक समय पहले महंत नंदानाथ उर्फ नंदा बाबा द्वारा कुछ शिवभक्तों के साथ शुरू की गई यह यात्रा आज बस्ती की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
सरयू के पवित्र जल से भरे कांवड़ लेकर जब श्रद्धालु भदेश्वरनाथ धाम की ओर बढ़ते हैं तो उनके साथ केवल जल नहीं होता—उनके कंधों पर आस्था, संकल्प और भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास भी होता है।
सिर्फ यात्रा नहीं, सेवा और सामाजिक एकता का संदेश
बाबा भदेश्वरनाथ की यह कांवड़ यात्रा धार्मिक दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है, सामाजिक दृष्टि से भी उतनी ही प्रभावशाली दिखाई देती है।
यात्रा मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं के लिए भोजन, पेयजल, चिकित्सा, विश्राम और अन्य आवश्यक सेवाओं की व्यवस्था की जाती है। स्थानीय नागरिक और विभिन्न सामाजिक संगठन सेवा भाव से इसमें भाग लेते हैं।
इस प्रकार कांवड़ यात्रा ने धर्म, सेवा, सहयोग और सामाजिक सहभागिता को एक साथ जोड़ने वाली परंपरा का रूप ले लिया है।
सरयू से भदेश्वरनाथ तक—आस्था की अखंड धारा
अयोध्या की सरयू नदी भारतीय धार्मिक चेतना में अत्यंत पवित्र स्थान रखती है। इसी पावन नदी का जल जब कांवड़ में लेकर श्रद्धालु बाबा भदेश्वरनाथ धाम पहुंचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं, तो यह यात्रा श्रद्धा की एक ऐसी परंपरा को जीवंत करती है जिसमें पीढ़ियां जुड़ती चली गई हैं।
1983 में कुछ शिवभक्तों से शुरू हुआ यह सफर आज विशाल जनआस्था का प्रतीक बन चुका है। चार दशकों से अधिक समय की इस यात्रा ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन ‘बोल बम’ की आस्था और बाबा भोलेनाथ के प्रति श्रद्धा लगातार मजबूत होती रही।
आज सावन में जब कांवड़ियों का विशाल कारवां भदेश्वरनाथ धाम की ओर बढ़ता है, तो यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं रह जाती। यह अयोध्या और बस्ती की सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत, जनभागीदारी, सेवा भावना और सनातन आस्था की जीवंत तस्वीर बन जाती है।
बोल बम के जयघोष के साथ सरयू से उठती आस्था की यह धारा हर सावन बाबा भदेश्वरनाथ के चरणों में पहुंचकर एक ही संदेश देती है—
“आस्था चलती रहे, सेवा बढ़ती रहे और महादेव का आशीर्वाद जन-जन तक पहुंचता रहे।”
रिपोर्ट : बस्ती ब्यूरो|लाइव भारत समाचार