बस्ती के दसिया में एथेनॉल फैक्ट्री को लेकर उभरा पर्यावरणीय संघर्ष: भारी विरोध, पुलिस छावनी में बदला इलाका, विकास बनाम पर्यावरण पर नई बहस
बस्ती, 14 जुलाई 2026 | लाइव भारत समाचार
उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के दसिया गांव में प्रस्तावित एथेनॉल फैक्ट्री को लेकर मंगलवार को अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। हजारों ग्रामीणों, किसानों और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों की मौजूदगी के बीच पूरा क्षेत्र पुलिस छावनी में तब्दील हो गया। प्रदर्शनकारियों ने फैक्ट्री निर्माण का विरोध करते हुए इसे कृषि, पर्यावरण, भूजल और ग्रामीण जीवन के लिए गंभीर खतरा बताया।
सुबह से ही ग्रामीणों ने जुलूस निकालकर फैक्ट्री स्थल तक पहुंचने और परियोजना का विरोध दर्ज कराने की घोषणा की थी। इसके मद्देनज़र प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की। कई थानों की पुलिस, पीएसी, तीन उपजिलाधिकारी (एसडीएम), अनेक क्षेत्राधिकारी (सीओ) तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी पूरे दिन मौके पर तैनात रहे। स्थिति पर लगातार निगरानी रखी गई ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना न हो।
जनप्रतिनिधियों को रास्ते में रोका गया
विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे समाजवादी पार्टी के सांसद राम प्रसाद चौधरी, विधायक राजेंद्र चौधरी तथा अन्य नेताओं को पुलिस ने दसिया मोड़ पर रोक दिया। इसके बाद नेताओं ने वहीं धरना देकर प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाए और ग्रामीणों के साथ एकजुटता व्यक्त की।
जनप्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि किसानों को परियोजना के वास्तविक प्रभावों की पूरी जानकारी दिए बिना भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। उनका कहना था कि यदि फैक्ट्री स्थापित होती है तो क्षेत्र की कृषि व्यवस्था, जल संसाधन और ग्रामीणों का स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
पर्यावरण बना आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा
प्रदर्शनकारियों का सबसे बड़ा तर्क पर्यावरण संरक्षण रहा। ग्रामीणों का कहना है कि एथेनॉल उद्योग से उत्पन्न अपशिष्ट जल यदि प्रभावी ढंग से प्रबंधित नहीं किया गया तो आसपास की कृषि भूमि और जल स्रोत प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने आशंका जताई कि भूजल का अत्यधिक दोहन क्षेत्र में जल संकट को और गंभीर बना सकता है।
किसानों ने कहा कि उनकी आजीविका पूरी तरह खेती पर आधारित है और यदि मिट्टी तथा जल की गुणवत्ता प्रभावित हुई तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी संकट में पड़ जाएगा। ग्रामीणों ने परियोजना से पहले विस्तृत एवं पारदर्शी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) तथा स्वतंत्र विशेषज्ञों की निगरानी में सार्वजनिक समीक्षा की मांग की।
पहले भी दर्ज कराया जा चुका है अनोखा विरोध
दसिया गांव का यह आंदोलन पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में रहा है। इससे पूर्व एक स्थानीय कार्यकर्ता ने अपने खून से प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर फैक्ट्री परियोजना पर पुनर्विचार की मांग की थी। ग्रामीणों का कहना है कि उनका आंदोलन किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि पर्यावरण, कृषि और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा के लिए है
वैश्विक संदर्भ में बढ़ती बहस
दुनिया भर में जैव ईंधन (Biofuel) को कार्बन उत्सर्जन कम करने के एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। अनेक देशों में एथेनॉल उत्पादन को ऊर्जा सुरक्षा और हरित अर्थव्यवस्था से जोड़ा गया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि किसी भी जैव ईंधन परियोजना की सफलता तभी संभव है जब पर्यावरण संरक्षण, जल संसाधनों का सतत उपयोग, स्थानीय समुदायों की सहमति और पारदर्शी नियामकीय व्यवस्था सुनिश्चित हो।
इसी कारण विश्वभर में बड़े औद्योगिक एवं ऊर्जा परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, सार्वजनिक सुनवाई, भूजल प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रशासन की चुनौती
दसिया में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने की है। प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम पर सतर्क निगरानी बनाए रखी और दिनभर स्थिति नियंत्रण में रही।
आगे क्या?
दसिया एथेनॉल परियोजना अब केवल एक औद्योगिक निवेश का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रामीण अधिकारों, पर्यावरणीय न्याय, कृषि सुरक्षा और सतत विकास की राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार, कंपनी, पर्यावरण विशेषज्ञ और स्थानीय समुदाय किस प्रकार संवाद स्थापित कर इस विवाद का संतुलित एवं टिकाऊ समाधान निकालते हैं।
रिपोर्ट ब्यूरो बस्ती|लाइव भारत समाचार